नेपाल में इंटरनेट सेंसरशिप और प्रोटेस्ट की बढ़ती लड़ाई 2025: डिजिटल आज़ादी की जंग

नेपाल, 2025: हिमालय की गोद में बसा यह खूबसूरत देश आज अपने इतिहास के एक नए और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। यहाँ की सड़कें एक बार फिर जनआकांक्षाओं और सरकारी दमन के बीच की लड़ाई का मैदान बनी हुई हैं, लेकिन इस बार यह लड़ाई सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है। यह लड़ाई डिजिटल है। यह लड़ाई इंटरनेट के बैंडविड्थ पर लड़ी जा रही है। 2025 का वर्ष नेपाल में “डिजिटल सत्याग्रह” और “इंटरनेट सेंसरशिप” के बीच बढ़ते तनाव के लिए चिन्हित हो चुका है।

यह सिर्फ एक इंटरनेट कनेक्शन ऑन या ऑफ करने की बात नहीं है। यह लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए लड़ी जा रही एक साइलेंट वॉर है। इस लेख में, हम गहराई से जानेंगे कि कैसे नेपाल सरकार द्वारा थोपी गई सेंसरशिप और जनता के प्रतिरोध ने 2025 की राजनीतिक रूपरेखा को बदल दिया है।

इंटरनेट सेंसरशिप क्या है? (What is Internet Censorship?)

इंटरनेट सेंसरशिप एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत सरकारें, संगठन या इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISPs) जानबूझकर इंटरनेट पर उपलब्ध सूचना, विचारों या समाचारों के प्रवाह को नियंत्रित, अवरुद्ध या प्रतिबंधित करते हैं। इसका उद्देश्य नागरिकों को特定 जानकारी तक पहुँचने से रोकना, विरोध के स्वरों को दबाना और सार्वजनिक बहस को नियंत्रित करना होता है। नेपाल में 2025 में यह प्रथा ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर तेजी से बढ़ी है।

पृष्ठभूमि: विवादास्पद कानूनों की शुरुआत

2025 की इस लड़ाई की जड़ें 2023-24 में ही देखी जा सकती हैं। सरकार ने कुछ ऐसे विवादास्पद कानूनों का प्रस्ताव रखा जिन्हें डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं ने “डिजिटल दमन का हथियार” करार दिया। इनमें से प्रमुख था:

  • IT Bill का संशोधित ड्राफ्ट: जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उनके उपयोगकर्ताओं की पोस्ट की जिम्मेदारी देना, ऑनलाइन आलोचना को ‘अपराध’ की श्रेणी में लाना और सरकार को बिना किसी वारंट के ऑनलाइन डेटा एक्सेस करने का अधिकार देना शामिल था।
  • साइबर सुरक्षा नीति: जिसके नाम पर व्यापक निगरानी तंत्र (Mass Surveillance System) स्थापित करने की बात की गई।

यही वह चिंगारी थी जिसने 2025 में आकर एक जनआंदोलन का रूप ले लिया।

2025: सेंसरशिप के नए तरीके और प्रोटेस्ट की नई रणनीतियाँ

1. लोकतंत्र पर ‘ब्लैकआउट’ का साया

2025 की शुरुआत में, एक बड़े छात्र आंदोलन के दौरान, सरकार ने पहली बार “सेलेक्टिव इंटरनेट शटडाउन” की रणनीति का इस्तेमाल किया। पूरा इंटरनेट बंद करने के बजाय, सिर्फ specific locations (जैसे यूनिवर्सिटी क्षेत्र, प्रदर्शन स्थल) पर Mobile Data सेवाएं अवरुद्ध कर दी गईं। साथ ही, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—Facebook, Twitter (X), Instagram और TikTok—को “अफवाहें फैलाने” के आरोप में धीमा (Throttling) कर दिया गया या कुछ घंटों के लिए पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया।

सरकार का तर्क था कि यह कदम “सार्वजनिक शांति और राष्ट्रीय सुरक्षा” के लिए जरूरी था। लेकिन, नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया।

2. डिजिटल प्रोटेस्ट: जनता का जवाब

लेकिन सरकार ने जनता की सूझबूझ और तकनीकी समझ को कम आंका। प्रतिबंधों के जवाब में एक मजबूत और तकनीक-सक्षम “डिजिटल प्रतिरोध” उभरा:

  • VPN (Virtual Private Network) का बढ़ता उपयोग: नेपाल के युवाओं और Aktivists ने ब्लॉक की गई वेबसाइटों और एप्स तक पहुँचने के लिए VPN का भारी इस्तेमाल शुरू कर दिया। #VPNForNepal और #DigitalRights जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
  • मैसेजिंग एप्स का रचनात्मक इस्तेमाल: एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म जैसे Telegram और Signal प्रोटेस्टर्स के बीच मुख्य संचार का जरिया बन गए। इन पर समन्वय किया जाने लगा और लाइव अपडेट शेयर किए जाने लगे।
  • डिजिटल मीडिया का उदय: मुख्यधारा के मीडिया पर दबाव के चलते, स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ पोर्टल्स और YouTube चैनल्स जमीन की हकीकत दिखाने का मुख्य स्रोत बन गए।

3. अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और दबाव

नेपाल में बढ़ती सेंसरशिप पर संयुक्त राष्ट्र (UN), एमनेस्टी इंटरनेशनल, और विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक की तरफ से चिंता जताई गई। कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने नेपाल सरकार से डिजिटल अधिकारों का सम्मान करने की अपील की। इस अंतरराष्ट्रीय दबाव ने सरकार की कार्यवाही पर एक अतिरिक्त ब्रेक का काम किया।

सेंसरशिप के प्रभाव: एक डबल-एज्ड तलवार

इंटरनेट सेंसरशिप का प्रभाव सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक भी रहा।

  • आर्थिक नुकसान: इंटरनेट बंद होने से ऑनलाइन व्यापार, डिजिटल पेमेंट सिस्टम, फ्रीलांसर्स और पर्यटन उद्योग को भारी नुकसान हुआ। एक अनुमान के मुताबिक, एक दिन के इंटरनेट शटडाउन से नेपाल की अर्थव्यवस्था को करोड़ों रुपये का नुकसान झेलना पड़ा।
  • शिक्षा पर प्रभाव: ऑनलाइन कक्षाएं और शैक्षणिक शोध बुरी तरह प्रभावित हुए, जिससे छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया।
  • सूचना का अकाल: आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं, महत्वपूर्ण सार्वजनिक घोषणाओं और समाचारों तक लोगों की पहुँच बाधित हुई।

भविष्य की राह: एक संतुलन की तलाश

नेपाल 2025 में एक क्रॉसरोड पर खड़ा है। एक तरफ सरकार की सुरक्षा और नियंत्रण की चिंताएँ हैं तो दूसरी तरफ जनता की स्वतंत्रता और पारदर्शिता की माँग।

भविष्य का रास्ता एक “डिजिटल संविधान” या एक “इंटरनेट बिल ऑफ राइट्स” से निकल सकता है, जो स्पष्ट रूप से परिभाषित करे कि किस आधार पर, कितनी देर के लिए और किस पारदर्शी प्रक्रिया के तहत ऐसे प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सिविल सोसाइटी, तकनीकी विशेषज्ञों और सरकार के बीच एक संवाद ही इस संकट का स्थायी हल हो सकता है।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की डिजिटल परीक्षा

नेपाल में 2025 का संघर्ष साबित करता है कि इंटरनेट कोई लक्जरी नहीं, बल्कि एक आवश्यक उपयोगिता और मौलिक अधिकार है। यह आधुनिक लोकतंत्र की रीढ़ है। सरकारें चाहे कितने भी प्रतिबंध क्यों न लगा लें, सच्चाई और आजादी की तलाश में लोग नए रास्ते ढूंढ ही लेते हैं। नेपाल की यह “डिजिटल सत्याग्रह” की कहानी दुनिया के हर उस देश के लिए एक सबक है जो इंटरनेट की आजादी पर अंकुश लगाने की सोच रहा है। अंततः, लोकतंत्र की ताकत नागरिकों की आवाज में होती है, चाहे वह आवाज सड़क पर गूंजे या इंटरनेट के डेटा पैकेट्स में सर्फ कर रही हो। नेपाल का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करेगा।

Leave a Comment